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दीयों की लौ से चमक रहा ग्रामीण हुनर, पर्यटन से संवर रही आजीविका- जयवीर सिंह

अयोध्या के दीपोत्सव में जब लाखों दीये रामनगरी को रोशन करेंगे, तब उनकी लौ में गांव की महिलाओं के हुनर, मेहनत और आत्मनिर्भरता की चमक भी नजर आएगी। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल अब स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार और आमदनी का जरिया बन रही है। दीपोत्सव-2026 के लिए बाराबंकी और अयोध्या की महिलाएं 1.60 लाख पारंपरिक मिट्टी के दीये तैयार कर रही हैं। प्रत्येक दीये की कीमत आठ रुपए तय की गई है। यह पहल धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन को ग्रामीण आजीविका और महिला सशक्तिकरण से जोड़ने की दिशा में अहम कदम है।

दीपोत्सव अपने दसवें संस्करण में प्रवेश कर रहा है। हर वर्ष दीप प्रज्ज्वलन के नए कीर्तिमान स्थापित करने वाला दीपोत्सव-2026 इस बार 30 लाख से अधिक दीयों की रोशनी से रामनगरी को आलोकित करेगा। इन दीयों में बड़ी संख्या उन ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए गए दीयों की होगी, जिनकी पारंपरिक कुम्हारी कला अब स्थानीय सीमाओं से निकलकर व्यापक पहचान और आजीविका का माध्यम बन रही है।

‘पर्यटन से रोजगार तक की पहल’
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ग्रामीण कला, संस्कृति, परंपराओं और स्थानीय उत्पादों को पर्यटन से जोड़कर रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है। दीपोत्सव-2026 के लिए दीये तैयार करने की पहल इसी उद्देश्य का हिस्सा है। इससे महिलाओं के पारंपरिक कौशल को बड़े सांस्कृतिक आयोजन से जोड़कर आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।’

25 से अधिक महिलाएं जुटी दीया निर्माण में
बाराबंकी के कजियापुर और ग्रामीण पर्यटन ग्राम भगहर झील के अलावा अयोध्या के ग्यासपुर की कुल 25 से अधिक महिलाएं दीये बनाने में जुटी हैं। ग्रामीण विकास की पहलों के तहत कुम्हारी कला का प्रशिक्षण ले चुकीं ये महिलाएं अपने हुनर को आमदनी में बदल रही हैं। प्रति दीया आठ रुपए की दर से मिलने वाला पारिश्रमिक उनके लिए आय का अतिरिक्त साधन बन रहा है। साथ ही, स्थानीय हस्तशिल्प को बड़े आयोजन से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

पर्यटन के साथ आजीविका को विस्तार
ग्रामीण पर्यटन का उद्देश्य गांवों की प्राकृतिक सुंदरता, लोक कला, हस्तशिल्प, खानपान और सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन अनुभव का हिस्सा बनाना है। इसके तहत स्थानीय लोगों को भी पर्यटन से पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधियों का लाभ दिलाने पर जोर है। दीपोत्सव जैसे बड़े आयोजन इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने का अवसर देते हैं। इनसे लाभ केवल पर्यटकों को सेवाएं देने वालों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हस्तशिल्प और घरेलू उत्पादन से जुड़े परिवारों तक भी पहुंचता है।

हुनर को पहचान, घर की आमदनी में योगदान
दीया निर्माण से जुड़ीं सुंदरा, साविधि और मीना ने बताया कि पारंपरिक कला के आधार पर काम मिलने से वे परिवार की आय में योगदान दे पा रही हैं। वहीं, राजेश्वरी, वीरमति और रीना का कहना है कि ऐसे अवसर महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ उनके कौशल को पहचान भी दिलाते हैं। उनके मुताबिक, कुम्हारी कला ग्रामीण जीवन और भारतीय परंपरा का अहम हिस्सा है। इसे बाजार से जोड़ना इसके संरक्षण के लिए जरूरी है। बड़े पैमाने पर दीये तैयार करने का यह काम अनुभवी कारीगरों को अवसर देने के साथ नई पीढ़ी तक इस कला को पहुंचाने का जरिया भी बन सकता है।

पारंपरिक कौशल दिखा रहे समृद्धि की राह- अमृत अभिजात
अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने बताया कि ‘ग्रामीण पर्यटन तभी सार्थक है, जब गांवों की परंपराएं और स्थानीय हुनर लोगों की आजीविका का मजबूत आधार बनें। दीपोत्सव-2026 के लिए ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे 1.60 लाख मिट्टी के दीये इस सोच को साकार कर रहे हैं। यह पहल हमारी समृद्ध कुम्हारी कला को विशिष्ट पहचान देने के साथ महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने का अवसर भी प्रदान कर रही है। हमारा लक्ष्य उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन से जोड़कर पारंपरिक हुनर को बाजार उपलब्ध कराना और स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के नए अवसर सृजित करना है।’

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