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बांग्लादेश ने कभी भारत को छोड़ा था पीछे, अब टूट रही है अर्थव्यवस्था की रीढ़

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के बोर्ड ने बांग्लादेश के लिए 4.7 अरब डॉलर के राहत कार्यक्रम को मंज़ूरी दी है.

इसी के साथ बांग्लादेश आईएमएफ़ की कई नई सुविधा का फ़ायदा उठाने वाला पहला देश बन गया है.

बांग्लादेश एक समय दक्षिण एशिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था था.

दो साल पहले बांग्लादेश ने जीडीपी के मामले में भारत को भी पछाड़ दिया था.

बांग्लादेश को दक्षिण एशिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती और मज़बूत होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना गया था.

लेकिन अब बांग्लादेश बदहाली की ओर बढ़ रहा है. अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए उसे आईएमएफ़ से क़र्ज़ मांगना पड़ा है.

एक समय था कि बांग्लादेश अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बखान करता था, लेकिन अब उसके सामने बैलेंस ऑफ़ पेमेंट (भुगतान देय) का संकट पैदा हो गया है.

ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉक्टर राशेद अल महमूद तितुमीर मानते हैं कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह लंबे समय तक नीचे की ओर आर्थिक दबाव, ग़ैर-संस्थागतकरण और राजनीतिक केंद्रीकरण है.

बांग्लादेश ने आईएमएफ़ से क़र्ज़ लिया है

प्रोफ़ेसर राशेद कहते हैं, “एक तरह से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर ख़तरा है और अगर इसका ठीक से प्रबंधन नहीं हुआ तो ये दबाव में आ जाएगी, अगर मौजूदा हालात का ठीक से प्रबंधन नहीं हुआ, तो निश्चित तौर पर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था संकट में आ जाएगी.”

अर्थव्यवस्था की तीन इकाइयाँ होती हैं. घरेलू आय, ओद्योगिक आय और सरकारी आय. इस समय बांग्लादेश में इन तीनों को ही कैश की ज़रूरत है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैलेंस ऑफ़ पेमेंट का संकट है और आईएमएफ़ के बांग्लादेश को दिए जा रहे प्रस्तावित क़र्ज़ पर देश में चर्चा हो रही है.

रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले ही बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार गिरने लगा था. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम बढ़ने से बांग्लादेश में महंगाई भी बढ़ रही है.

रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से भी महंगाई का संकट भी पैदा हो गया है.

विश्लेषक मानते हैं कि इन सभी कारणों से ही बांग्लादेश में आर्थिक संकट पैदा हो रहा है.

प्रोफ़ेसर राशेद तितुमीर कहते हैं, “अभी हम देख रहे हैं कि बांग्लादेश में लोगों की घरेलू आय कम हो रही है. बांग्लादेश में अधिकतर लोग अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं और यहाँ कोई मज़बूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था भी नहीं है.

हुआ ये है कि कोविड महामारी के दौरान लोगों की घरेलू आय कम हुई और वो ख़र्च के लिए क़र्ज़ लेने लगे. बढ़ती महंगाई ने घरों की अर्थव्यवस्था बिगाड़ दी और ये संकट और गहरा हो गया.”

देश में पैदा हुए नए ग़रीब

बांग्लादेश का श्रमिक वर्ग उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है. लेकिन तेज़ी से बढ़ती महंगाई ने देश में नए ग़रीब पैदा कर दिए हैं.

ये वो लोग हैं, जो अब तक अपनी आय से अपना परिवार चला पा रहे थे, लेकिन महंगाई की वजह से ज़रूरतें पूरी करने के लिए इन्हें क़र्ज़ लेना पड़ रहा है.

पिछले साल हुए एक शोध के मुताबिक़ बांग्लादेश की आबादी में कुल 3 करोड़ 9 लाख लोग नए ग़रीब हैं, जो कुल आबादी का 18.54 प्रतिशत हैं.

इस शोध से पता चला था कि बांग्लादेश में अधिकतर परिवारों ने ख़र्च कम करने के लिए खाद्य पदार्थों की ख़रीद में कटौती की है.

प्रोफ़ेसर राशेद तितुमीर कहते हैं, “बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का ढाँचा कुछ ऐसा है कि बढ़ती महंगाई ने देश में नए ग़रीबों का एक वर्ग पैदा कर दिया. अगर महमारी से पहले के स्तर से तुलना की जाए तो अब देश में नए ग़रीब पैदा हो गए हैं.

इन लोगों की आय इतनी नहीं बढ़ी है जितनी महंगाई बढ़ी है. इसकी वजह से इनके पास पैसा नहीं है और ख़र्च चलाने के लिए इन्हें क़र्ज़ लेना पड़ रहा है. वहीं मध्यम वर्ग की बड़ी आबादी अपना ख़र्च चलाने के लिए क्रेडिट कार्ड पर निर्भर हो गई है.”

लेकिन क़र्ज़ का ये संकट सिर्फ़ आम लोगों तक ही सीमित नहीं है. सरकार को भी अपना ख़र्च चलाने के लिए क़र्ज़ लेना पड़ रहा है.

अगर राज्य के स्तर पर देखा जाए, तो सरकार ने रिकॉर्ड स्तर पर क़र्ज़ लिया है. सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष में एक ट्रिलियन टका का क़र्ज़ ले लिया है.

सरकार को लेना पड़ रहा है क़र्ज़

प्रोफ़ेसर तितुमीर कहते हैं, “बांग्लादेश का सकल घरेलू उत्पाद और टैक्स अनुपात दक्षिण एशिया में सबसे कम है. ये बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की ढाँचागत समस्या है. अफ़ग़ानिस्तान के बाद सबसे कम जीडीपी-टैक्स अनुपात बांग्लादेश का ही है.

महंगाई की वजह से लोगों की ख़रीद कम हुई है जिसका असर वैट (वैल्यू ऐडेड टैक्स) पर हुआ है और सरकार की आय गिरी है. जो जीडीपी-टैक्स अनुपात पहले से ही कम था वो और भी गिर गया है. ऐसे में सरकार के पास केंद्रीय बैंक से क़र्ज़ लेने के अलावा कोई उपाय नहीं रह गया है. सरकार क़र्ज़ ले रही है, बावजूद इसके कई प्रोजेक्ट के लिए फ़ंड नहीं दे पा रही है.”

बांग्लादेश के ख़राब हो रहे आर्थिक हालात की एक वजह ये भी है कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था खपत आधारित है. लेकिन महंगाई बढ़ने की वजह से लोगों की क्रय शक्ति कम हुई और जीडीपी गिरने लगा.

प्रोफ़ेसर तितुमीर कहते हैं, “बांग्लादेश की अर्थव्यवसथा की प्रगति खपत आधारित रही है. खपत आधारित आर्थिक विकास सतत नहीं होता है. बांग्लादेश के आर्थिक विकास में प्रवासी मज़दूरों (जिनमें महिलाओं की संख्या बहुत अधिक है) की भूमिका रही है.

मज़दूर वर्ग की आय बढ़ी तो ख़र्च बढ़ा और इसका असर आर्थिक विकास पर हुआ. लेकिन खपत आधारित आर्थिक विकास की समस्या ये है कि इससे मांग बढ़ती रहती है जबकि निवेश आधारित आर्थिक विकास से क्षमता बढ़ती है.”

वे आगे बताते हैं, ”बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की मूल समस्या यही है. खपत आधारित अर्थव्यवस्था में आयात की मांग बढ़ती रहती है, ऐसे में जब बाहरी बाज़ार में दाम बढ़ते है तो इसका सीधा असर भुगतान देय पर पड़ता है. बांग्लादेश में यही हुआ है.

अगर बांग्लादेश ने अपनी उत्पादन क्षमता में निवेश किया होता तो वो बाहरी कारणों से कुछ हद तक अपने आप को बचा लेता. कोविड महामारी और फिर रूस यूक्रेन युद्ध जैसे बाहरी कारणों ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित किया है और यही वजह है कि किसी समय तेज़ी से आगे बढ़ रही बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था अब संकट में जाती दिख रही है.”

विश्लेषक मानते हैं कि बांग्लादेश में एक समस्या अर्थव्यस्था के प्रबंधन की भी है. 1971 से लेकर साल 2017 तक सरकार ने जितना क़र्ज़ लिया था, उतना ही क़र्ज़ सरकार ने बीते पाँच सालों में ले लिया है.

प्रोफ़ेसर तितुमीर कहते हैं, “इसका सीधा मतलब ये है कि अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में ही समस्या है. संस्थागत स्तर पर समस्याएँ हैं, जिनका तुरंत समाधान खोजे जाने की ज़रूरत है.”

महंगाई की वजह से बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार भी तेज़ी से गिरा है.

दिसंबर 2022 में बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार 30 अरब डॉलर था. जबकि जनवरी 2022 में ये 44.9 अरब डॉलर था.

यानी बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार गिर रहा है.

प्रोफ़ेसर तितुमीर कहते हैं, “दुनियाभर में शायद ही कहीं ऐसा हो कि सेंट्रल बैंक के बाहर विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति की घोषणा करने वाला चमकीला बोर्ड लगा हो. लेकिन बांग्लादेश में ऐसा था, सेंट्रल बैंक के बाहर चमकीले बोर्ड पर देश के विदेशी मुद्रा भंडार का आँकड़ा प्रदर्शित होता था.

लेकिन अब देश में विदेशी मुद्रा भंडार का ही संकट है. इसका सीधा मतलब ये है कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में बाहरी झटकों को बर्दाश्त कर लेने की क्षमता नहीं थी, या इस क्षमता को विकसित नहीं किया गया.”

बांग्लादेश कपड़ों का निर्यात करता है. जूट उसका मुख्य निर्यात है

समस्या की जड़ में बैलेंस ऑफ़ पेमेंट

विशेषज्ञों के मुताबिक़, बांग्लादेश में पैदा हो रहे आर्थिक संकट के मूल में भुगतान संतुलन का संकट है. सिर्फ़ बांग्लादेश ही नहीं दुनिया के कई और देश भी इस संकट का सामना कर रहे हैं.

दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “कोविड महामारी से दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं को धक्का लगा था. इसमें भारत भी शामिल है. उसके बाद यूक्रेन युद्ध शुरू हो गया जिसकी वजह से दाम बढ़ने लगे.

चीज़ों के दाम बढ़ने की वजह से कई देशों का भुगतान देय (बैलेंस ऑफ़ पेमेंट) बिगड़ गया. श्रीलंका इसका उदाहरण है. वहाँ इसकी वजह से गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो गया. ऐसा लग रहा था कि बांग्लादेश इस स्थिति में नहीं आएगा. लेकिन अब वहाँ भी बैलेंस ऑफ़ पेमेंट का संकट पैदा हो रहा है.

उन्होंने बताया कि कच्चे तेल और बाक़ी अन्य चीज़ों के दाम बढ़ने की वजह से देशों के आयात बिल बढ़ गए. इसका भी असर बांग्लादेश पर पड़ा. जब किसी देश का बैलेंस ऑफ़ पेमेंट बिगड़ता है तो इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है. विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है तो क़र्ज़ की स्थिति भी बिगड़ जाती है, देश को क़र्ज़ की किश्त चुकाने में दिक़्क़तें होती हैं. बांग्लादेश को अब अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए क़र्ज़ लेना पड़ रहा है.

अक्तूबर 2020 में ये अनुमान ज़ाहिर किए गए थे कि बांग्लादेश प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में 2021 में भारत को पीछे छोड़ देगा.

जुलाई 2021 में जीडीपी विकास दर के मामले में बांग्लादेश भारत से आगे निकल गया था. हालाँकि भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाओं में बहुत बड़ा अंतर है और दोनों की तुलना उचित नहीं है.

बांग्लादेश की जीडीपी साल 1960 में 4 अरब डॉलर थी. साल 2021 में ये 416 अरब डॉलर तक पहुँच गई थी. यानी 50 सालों में बांग्लादेश ने 100 गुना से अधिक की बढ़ोतरी की. लेकिन कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध का सीधा असर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा.

बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा उद्योग है. यह अर्थव्यवस्था की प्रमुख प्रेरक शक्तियों में से एक है

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही थी, लेकिन पहले कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध ने इसे प्रभावित कर दिया. बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर ऐसे कारणों का कम असर होता है, लेकिन जो छोटी अर्थव्यवस्थाएँ होती हैं, वो तेज़ी से प्रभावित होती हैं.

बांग्लादेश अपने कपड़ों के निर्यात से बैलेंस ऑफ़ पेमेंट को बनाए रखता था. वो अधिकतर यूरोपीय देशों और विकसित देशों को कपड़े भेजता है. लेकिन महामारी और युद्ध ने इन बाज़ारों को भी प्रभावित किया और बांग्लादेश का गार्मेंट एक्सपोर्ट कम हो गया.”

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “दुनिया में एक तरह का शीत युद्ध भी चल रहा है. एक तरफ़ पश्चिमी देश हैं और दूसरी तरफ़ रूस, चीन और ईरान जैसे देश हैं. इस शीत युद्ध ने बाज़ारों को भी प्रभावित किया है. इसका सीधा असर बांग्लादेश जैसी छोटी अर्थव्यवस्थाओं पर हो रहा है.”

क्या बांग्लादेश की मदद करेगा भारत?

बांग्लादेश में ख़राब हो रहे आर्थिक हालात के बीच ये सवाल उठ रहा है कि क्या बांग्लादेश श्रीलंका के रास्ते पर जा रहा है और अगर ऐसा हुआ तो क्या भारत बांग्लादेश की मदद के लिए आगे आएगा.

बेंगलुरू की क्राइस्ट चर्च यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पैनी नज़र रखने वाले डॉक्टर राजीब सूत्रधार कहते हैं, “बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था अभी इतनी ख़राब नहीं है कि उसकी तुलना श्रीलंका की अर्थव्यवस्था से की जाए. दो साल पहले तक बांग्लादेश सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक था.

लेकिन बांग्लादेश एक रिस्क ज़ोन (ख़तरे) में रहने वाला देश है और उसकी अर्थव्यवस्था बहुत हद तक कपड़ों के निर्यात पर निर्भर है. ऐसे में महंगाई ने अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाई है. लेकिन वहाँ आर्थिक हालात अभी इतने ख़राब नहीं है कि श्रीलंका से तुलना की जाए.”

बांग्लादेश के भारत से रिश्ते पिछले सालों के मुक़ाबले और बेहतर हुए हैं. एक साल के भीतर ही प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने भारत की यात्रा की थी.

बांग्लादेश भारत के सबसे बड़े कारोबारी सहयोगियों में से एक है. भारत के कई सेक्टर बांग्लादेश पर निर्भर करते हैं.

डॉक्टर राजीब सूत्रधार कहते हैं, “आजकल ग्लोबल सप्लाई चेन का ज़माना है. कुछ उत्पादों के कुछ हिस्से बांग्लादेश में बनते हैं और कुछ भारत में, ऐसे में भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं. अगर बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति बहुत ज़्यादा ख़राब होती है, तो उसका असर भारत के कुछ सेक्टर पर भी पड़ सकता है.”

विश्लेषक बांग्लादेश में बिगड़ रहे आर्थिक हालात को भारत के लिए दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने के मौक़े के रूप में भी देखते हैं.

डॉक्टर राजीब सूत्रधार कहते हैं, “इसका एक और पहलू ये भी है कि अगर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और ख़राब होती है, तो भारत के पास दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर हो सकता है. जिस तरह श्रीलंका में चीन का प्रभाव बढ़ रहा था और आर्थिक संकट के समय भारत ने मदद की और अपना प्रभाव बढ़ाया, वैसे ही भारत चाहे तो बांग्लादेश में भी कर सकता है.”

किसी भी देश में ख़राब होते आर्थिक हालात वहाँ की राजनीति को भी प्रभावित करते हैं. विश्लेषक ये आशंका भी ज़ाहिर करते हैं कि अगर बांग्लादेश में आर्थिक स्थिति और ख़राब होती गई तो वहाँ कट्टरपंथ भी जड़ें जमा सकता है.

सूत्रधार कहते हैं, “बांग्लादेश में पिछले दो-ढाई दशकों में कट्टरपंथी तत्व भी मज़बूत हुए हैं. अगर वहाँ के आर्थिक हालत और ख़राब हुए तो ये कट्टरपंथी तत्व और भी मज़बूत हो सकते हैं, जो बांग्लादेश के लिए बहुत अच्छा संकेत नहीं होगा. ऐसे में अगर बांग्लादेश की आर्थिक हालत और भी ख़राब होती है तो भारत को मदद के लिए आगे आना चाहिए ताकि कट्टरपंथ को वहाँ बढ़ने से रोका जा सके.”

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