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बलिया में लोकगाथा ‘लोरिकायन’ को मिलेगा आधुनिक मंच

वीर लोरिक की स्मृति में ₹4.97 करोड़ की लागत से बनेगा 350 सीटों वाला ऑडिटोरियम

लखनऊ/बलिया, 21 सितंबर 2026। भोजपुरी लोक महाकाव्य ‘लोरिकायन’ को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और वीर लोरिक की लोक विरासत को संरक्षित करने के लिए बलिया में आधुनिक सांस्कृतिक मंच तैयार किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग की ओर से हसनपुरा राजस्व गांव, बिसौली पोस्ट, बांसडीह तहसील में वीर लोरिक की स्मृति में 350 सीटों वाला ऑडिटोरियम बनाया जा रहा है।

परियोजना की कुल लागत 4.97 करोड़ रुपये है। इसके लिए पहली किस्त के रूप में 1.36 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं और निर्माण की आधारभूत प्रक्रिया शुरू हो गई है।

लोककला और कलाकारों को मिलेगा आधुनिक मंच

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि वीर लोरिक की वीरता और उनकी लोकगाथाएं उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके अनुसार, लोरिक की कहानियां साहस, वीरता और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का संदेश देती हैं। हसनपुरा में बनने वाला ऑडिटोरियम और पुस्तकालय इस विरासत को संरक्षित करने के साथ युवा पीढ़ी को वीर लोरिक के जीवन और योगदान से जोड़ने में मदद करेगा।

ऑडिटोरियम में उन्नत साउंड सिस्टम, एचडी सिनेमैटिक प्रोजेक्शन, इंटेलिजेंट एलईडी लाइटिंग और ध्वनिकी के अनुरूप डिजाइन किए गए इंटीरियर की व्यवस्था होगी। यहां लोक संगीत, नाटक, कहानी वाचन और दृश्य प्रस्तुतियों के माध्यम से लोरिकायन की गाथा को मंच पर प्रस्तुत किया जा सकेगा।

स्थानीय कलाकारों और सांस्कृतिक समूहों को मिलेगा अवसर

नया ऑडिटोरियम बलिया के विद्यार्थियों, स्थानीय कलाकारों और सांस्कृतिक संगठनों के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों का समर्पित मंच भी बनेगा। आधुनिक मंच व्यवस्था और दर्शकों के लिए आवश्यक सुविधाओं के जरिए जिले की लोक विरासत को जीवंत परंपरा के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा।

वीर लोरिक की गाथा में साहस और संघर्ष की कहानी

लोक परंपराओं के अनुसार, वीर लोरिक का जन्म बलिया के सिकंदरपुर तहसील के गौरा गांव में हुआ था और वे भोजपुरी लोक महाकाव्य ‘लोरिकायन’ के प्रमुख नायक माने जाते हैं। उनकी असाधारण शक्ति और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की कथाएं आज भी क्षेत्र में लोकगीतों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से सुनाई जाती हैं।

लोकगाथा की चर्चित कथाओं में मंजरी को सोनभद्र के अत्याचारी शासक से मुक्त कराने और युद्ध में उसे पराजित करने की कहानी शामिल है। वहीं, मारकुंडी घाटी के वीर लोरिक पत्थर से जुड़ी लोककथा में कहा जाता है कि लोरिक ने मंजरी के अनुरोध पर अपनी तलवार के एक वार से विशाल चट्टान को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया था। यह चट्टान लोक परंपरा में साहस और प्रेम के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।

स्मृति को संरक्षित करने की दिशा में नया कदम

बलिया में वीर लोरिक अखाड़ा, उनकी प्रतिमा और वीर लोरिक स्पोर्ट्स स्टेडियम पहले से ही उनकी स्मृति को जीवित रखने में योगदान दे रहे हैं। अब नया ऑडिटोरियम और पुस्तकालय उनकी जीवनगाथा, वीरता और लोक विरासत को संरक्षित करने, मंचित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए एक नया सांस्कृतिक मंच उपलब्ध कराएगा।

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