यूपी में पहली बार सेल थेरेपी से यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज
उत्तर प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार सेल्स से यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज, अपोलोमेडिक्स ने रचा इतिहास

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार किए गए सेल्स की मदद से यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर (पेशाब की नली सिकुड़ने की बीमारी) का सफल इलाज कर चिकित्सा क्षेत्र में नई उपलब्धि हासिल की गई है। लखनऊ स्थित अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने अत्याधुनिक सेल-आधारित यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर सर्जरी के माध्यम से 30 वर्षीय मरीज का सफल उपचार किया। ऑपरेशन के अगले ही दिन मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
अस्पताल के अनुसार, मरीज लंबे समय से करीब तीन सेंटीमीटर लंबे यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर से पीड़ित था। पारंपरिक इलाज में मरीज के मुंह के अंदर से बड़े आकार का ऊतक निकालकर सर्जरी की जाती है, जिससे कई सप्ताह तक खाने-पीने में परेशानी और अन्य असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा एंडोस्कोपिक या ऑप्टिकल इंटरनल यूरेथ्रोटॉमी जैसी तकनीकों में बीमारी दोबारा होने और लंबे समय तक कैथेटर रखने की संभावना बनी रहती है।
लैब में तैयार किए गए 50 लाख सेल्स का हुआ उपयोग
अपोलोमेडिक्स के यूरोलॉजी विभाग के चिकित्सकों ने मरीज के मुंह के अंदर से केवल लगभग 10 मिलीमीटर लंबा और 5 मिलीमीटर चौड़ा ऊतक का छोटा नमूना लिया। इस टिश्यू को विशेष लैब में भेजा गया, जहां टिश्यू इंजीनियरिंग तकनीक की मदद से अगले दो सप्ताह में करीब 50 लाख सेल्स विकसित किए गए। इन सेल्स को नियंत्रित तापमान (कोल्ड चेन) में सुरक्षित रूप से वापस लखनऊ लाया गया।
इसके बाद इन विकसित सेल्स को लिक्विड फाइब्रिन के साथ मिलाकर दूरबीन (एंडोस्कोपिक) तकनीक से सिकुड़ी हुई पेशाब की नली पर लगाया गया। चिकित्सकों के अनुसार, यह प्रक्रिया घाव भरने की प्राकृतिक क्षमता को बढ़ाती है और दोबारा नली सिकुड़ने की संभावना को कम करती है।

कम चीरा, कम दर्द और तेज रिकवरी
अपोलोमेडिक्स अस्पताल के डायरेक्टर एवं हेड, यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट, डॉ. मयंक सोमानी ने बताया कि इस तकनीक में शरीर पर कोई बड़ा चीरा नहीं लगाया जाता। मुंह के अंदर से केवल एक छोटा-सा नमूना लिया जाता है और पूरी प्रक्रिया लगभग 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है। जहां पारंपरिक सर्जरी के बाद मरीज को दो से तीन सप्ताह तक कैथेटर रखना पड़ता है, वहीं इस तकनीक में इसे लगभग एक सप्ताह बाद हटाया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि मरीज की स्थिति बेहतर है और ऑपरेशन के अगले ही दिन उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
70 से 80 प्रतिशत तक सफलता की संभावना
अपोलोमेडिक्स अस्पताल के एसोसिएट डायरेक्टर, यूरोलॉजी, डॉ. वेद भास्कर ने बताया कि पुरुषों में पेशाब की नली का सिकुड़ना संक्रमण, चोट या पहले किए गए उपचार के कारण हो सकता है। यह नई तकनीक हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन सही मरीजों में इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है, जो पारंपरिक ओपन सर्जरी के बराबर मानी जाती है।
उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया से मरीजों को कम दर्द होता है, रिकवरी तेज होती है और वे जल्दी सामान्य जीवन में लौट सकते हैं। अस्पताल का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में कम चीरा लगाने वाली आधुनिक यूरोलॉजी सर्जरी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
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