सी.आई.आई. में ‘हर आखिरी लड़की’ पुस्तक का विमोचन, शिक्षा पर गहन संवाद

लखनऊ, फरवरी 2026। Confederation of Indian Industry (सी.आई.आई.) द्वारा आयोजित एक प्रभावशाली कार्यक्रम में शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अवसर पर ‘हर आखिरी लड़की: भारत की भूली-बिसरी बेटियों को शिक्षित करने की यात्रा’ पुस्तक का विमोचन किया गया। पुस्तक का अनावरण सफीना हुसैन ने किया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा के साथ उनका संवाद हुआ, जबकि संचालन शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. नूर खान ने किया।
कार्यक्रम में आंकड़ों के साथ-साथ जमीनी अनुभवों और मानवीय कहानियों को साझा किया गया, जिससे भारत में बालिका शिक्षा के बदलते परिदृश्य पर गहन चर्चा हुई।
राजस्थान से 30,000 गाँवों तक की यात्रा
साल 2007 में राजस्थान के कुछ गांवों से शुरू हुई पहल आज 30,000 गांवों तक पहुंच चुकी है। एजुकेट गर्ल्स के 55,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने अब तक 20 लाख से अधिक स्कूल-बाहर लड़कियों को पुनः शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा है। वर्ष 2025 में संस्था को एशिया के प्रतिष्ठित Ramon Magsaysay Award Foundation द्वारा दिए जाने वाले रामोन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिससे यह सम्मान पाने वाली भारत की पहली संस्था बनी।
आंकड़ों के पीछे की कहानियां
पुरस्कार पर प्रतिक्रिया देते हुए सफीना हुसैन ने कहा कि यह उपलब्धि केवल संस्था की नहीं, बल्कि भारत में बालिका शिक्षा आंदोलन की मान्यता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2035 तक 1 करोड़ शिक्षार्थियों तक पहुंचना उनका लक्ष्य है। “यदि लड़कियां दसवीं कक्षा पूरी नहीं करतीं, तो वे मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से बाहर रह जाती हैं। इस चुनौती पर काम करना आवश्यक है,” उन्होंने कहा।
डॉ. नूर खान ने कहा कि नामांकन दर में वृद्धि के बावजूद स्कूल-बाहर लड़कियों की समस्या अभी भी मौजूद है, जिसे दूर करने की आवश्यकता है।
पार्थ सारथी सेन शर्मा ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य रखते हुए कहा कि पिछले 50 वर्षों में शिक्षा के बड़े आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। “लिंग समानता सूचकांक जहां पहले 60 के आसपास था, वह अब 100 प्रतिशत तक पहुंच गया है। हालांकि राज्यवार असमानताएं अभी भी हैं। बड़े आंकड़े कहानियां नहीं दिखाते, इसलिए जमीनी अनुभवों को समझना जरूरी है,” उन्होंने कहा।
भविष्य की दिशा
कार्यक्रम में यह संदेश उभरकर सामने आया कि बालिका शिक्षा केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। पुस्तक ‘हर आखिरी लड़की’ को सामुदायिक नेतृत्व और सामूहिक प्रयासों की प्रेरक कहानी के रूप में प्रस्तुत किया गया।
एजुकेट गर्ल्स के बारे में
एजुकेट गर्ल्स एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो ग्रामीण और हाशिए पर स्थित समुदायों की बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ने का कार्य करती है। वर्ष 2007 से संस्था राज्य सरकारों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से स्कूल-बाहर लड़कियों की पहचान, नामांकन और निरंतरता सुनिश्चित कर रही है।
संस्था के द्वितीय अवसर कार्यक्रम के तहत किशोरियों और युवतियों को दसवीं-बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने, जीवन कौशल विकसित करने और आत्मनिर्भर बनने में सहायता दी जाती है। अब तक संस्था राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के 30,000 गांवों में 20 लाख लड़कियों का नामांकन सुनिश्चित कर चुकी है तथा 24 लाख से अधिक बच्चों की शिक्षा सुदृढ़ की है।
2035 तक 1 करोड़ शिक्षार्थियों को सशक्त बनाने का लक्ष्य लेकर संस्था आगे बढ़ रही है।




