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जानिए आखिर क्यों भगवान शिव को पंसद है बिल्व पत्र,पढ़े ये पुराणकथा

शिव भक्तों के लिए मनाया जाने वाला पर्व महाशिवरात्रि इस साल 1 मार्च को मनाई जाने वाली है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं वह कथा जिसके जरिये आपको पता चलेगा कि भगवान शिव को बिल्व पत्र क्यों लगते हैं अच्छे?

आखिर क्यों भगवान शिव को पसंद है बिल्व पत्र- नारदजी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा- प्रभु! आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है? हे त्रिलोकीनाथ! आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है? शिवजी बोले- नारदजी! वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं। मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है। जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं, मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं। नारदजी भगवान शंकर और माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए। उनके जाने के पश्चात पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- हे प्रभु! मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बिल्व पत्र इतने प्रिय क्यों है? कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें। शिवजी बोले- हे शिवे! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं। उसका त्रिपत्र यानी 3 पत्ते ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं। शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं। बिल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें, जो ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप है। स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर बिल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था। यह सुनकर पार्वतीजी कौतूहल में पड़ गईं। उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर बिल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया? आप यह कथा विस्तार से कहें। भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की। हे देवी! सतयुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था।

ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था फलत: मेरे अनुग्रह से वाग्देवी सबकी प्रिया हो गईं। वे भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं। मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई अत: लक्ष्मी देवी चिंतित और रुष्ट होकर परम उत्तम श्री शैल पर्वत पर चली गईं। वहां उन्होंने मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारंभ कर दी। हे परमेश्वरी! कुछ समय बाद महालक्ष्मीजी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा ऊर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपने पत्र-पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगीं। इस तरह उन्होंने कोटि वर्ष (1 करोड़ वर्ष) तक आराधना की। अंतत: उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ। महालक्ष्मी ने मांगा कि श्रीहरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है, वह समाप्त हो जाए। शिवजी बोले- मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्रीहरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है। वाग्देवी के प्रति तो उनकी श्रद्धा है।

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