बिहार की दुल्हन के पारंपरिक आभूषण: सादगी, संस्कृति और सोने की चमक का खूबसूरत संगम

चोकर से लेकर सीता हार और नथ तक, बिहारी दुल्हन के श्रृंगार में आज भी जीवंत हैं सदियों पुरानी परंपराएं
पटना। बिहार की शादियां अपनी रंग-बिरंगी रस्मों, पारंपरिक परिधानों और कई दिनों तक चलने वाले उत्सवों के लिए जानी जाती हैं। इन समारोहों में बिहारी दुल्हन का पारंपरिक श्रृंगार खास आकर्षण का केंद्र होता है। खासतौर पर सोने के आभूषण उसकी खूबसूरती के साथ-साथ बिहार की संस्कृति और पारंपरिक विरासत को भी दर्शाते हैं।
जरी की साड़ी और पारंपरिक परिधान के साथ दुल्हन का आभूषणों से सजा रूप बेहद खास नजर आता है। बिहार की कई पारंपरिक ज्वेलरी आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपराओं का हिस्सा हैं।
चोकर
सोने से बना बारीक और जालीदार डिजाइन वाला चोकर बिहारी दुल्हन के आभूषणों में प्रमुख स्थान रखता है। इसे आमतौर पर लंबे हार के साथ पहना जाता है, जिससे दुल्हन का नेकलाइन लुक और भी आकर्षक बनता है।

चंद्रहार
चंद्रहार एक लंबा, लेयर्ड नेकलेस होता है, जिसे सोने और मोतियों से तैयार किया जाता है। इसमें दोनों ओर फूलों की आकृति वाले लॉकट लगे होते हैं। यह दुल्हन के पारंपरिक श्रृंगार को भव्यता प्रदान करता है।

टिकली
मांग टीका से मिलता-जुलता टिकली सिर के बीचों-बीच बालों की मांग में पहना जाने वाला आभूषण है। इसे अक्सर कीमती या रंगीन पत्थरों से सजाया जाता है और यह दुल्हन के माथे की खूबसूरती को निखारता है।

पंचलड़ी
नाम के अनुरूप पंचलड़ी हार में पांच परतें होती हैं। इसे पारंपरिक रूप से मोतियों और रंगीन रत्नों से तैयार किया जाता है। प्रत्येक परत में एक छोटा और आकर्षक लॉकेट इसकी खासियत होता है।

सतलड़ी
सतलड़ी सात परतों वाला पारंपरिक हार है। इसमें मोतियों और कीमती पत्थरों से जड़े लॉकेट होते हैं। यह उत्तर और दक्षिण भारत में लोकप्रिय सात लड़ी हार की परंपरा से भी मिलता-जुलता है।

सीता हार
सीता हार एक लंबा और आकर्षक स्टेटमेंट नेकलेस है, जो दुल्हन की कमर तक पहुंच सकता है। इसे छोटे हारों के साथ पहनने पर पारंपरिक दुल्हन का लुक और भी शानदार दिखाई देता है।
नाथ
बिहारी दुल्हन के श्रृंगार में नथ का भी विशेष महत्व है। बड़ी और पारंपरिक सोने की नथ को नाक में पहना जाता है। इसके साथ लगी चेन को बालों से जोड़ा जाता है, जिससे नथ को सहारा मिलता है।

ढोलना
ढोलना में ढोल के आकार का खूबसूरत सोने का लॉकेट होता है। यह केवल विवाह के अवसर पर ही नहीं, बल्कि बिहार की महिलाओं द्वारा विभिन्न पारंपरिक और त्योहारों के अवसरों पर भी पहना जाता है।

चूड़ियां और कंगन
दुल्हन के हाथों का श्रृंगार चूड़ियों के बिना अधूरा माना जाता है। बिहारी दुल्हनें रंगीन कांच की चूड़ियों के साथ भारी सोने के कंगन या बाली भी पहनती हैं। ये आभूषण शादी के साथ-साथ अन्य शुभ अवसरों पर भी पहने जाते हैं।

मौरी
मौरी बिहारी विवाह परंपरा से जुड़ा खास सिर का आभूषण या हेडगेयर है। पारंपरिक रूप से इसे आम या खजूर के पत्तों से तैयार किया जाता था। आधुनिक समय में इसे कागज, सजावटी सामग्री और शीशों से भी तैयार किया जाता है।
बिछुआ
बिछुआ पैर की उंगलियों में पहना जाने वाला पारंपरिक आभूषण है। बिहार की दुल्हनें इसे शादी के बाद सुहाग के प्रतीक के रूप में धारण करती हैं। इसे आमतौर पर चांदी या सोने से बनाया जाता है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम
बिहारी दुल्हन के आभूषण केवल सजावट का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और वैवाहिक जीवन से जुड़े प्रतीकों को भी अपने भीतर समेटे हुए हैं। बदलते फैशन के दौर में इनके डिजाइन और पहनने के अंदाज में बदलाव जरूर आया है, लेकिन चोकर, चंद्रहार, टिकली, नथ, सीता हार, मौरी और बिछुआ जैसे पारंपरिक आभूषण आज भी बिहारी दुल्हन के श्रृंगार की पहचान बने हुए हैं।
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