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समन्वय के अभाव में पिछड़ता समाज-जितेन्द्र कुशवाहा

दिल्ली : समाज के सामने सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सामाजिक संगठनों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है, लेकिन समाज का अपेक्षित चहुंमुखी विकास आज भी अधूरा है। समाज के नाम पर हजारों संगठन, सैकड़ों अध्यक्ष और अनेक राष्ट्रीय अध्यक्ष मौजूद हैं, फिर भी शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और नेतृत्व के क्षेत्र में समाज पीछे खड़ा दिखाई देता है। इसका मूल कारण सामाजिक संगठनों के बीच समन्वय की गंभीर कमी है।


समाजसेवी जितेंद्र कुशवाहा ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सामाजिक संगठन समाज के विकास के लिए बनाए जाते हैं, न कि व्यक्तिगत पहचान और पद की राजनीति के लिए। लेकिन आज स्थिति यह है कि संगठन सेवा का माध्यम बनने के बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का मंच बनते जा रहे हैं। पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव की होड़ ने समाज की सामूहिक शक्ति को कमजोर कर दिया है।


उन्होंने कहा कि एक ही समाज के नाम पर अनेक संगठन काम कर रहे हैं, लेकिन न कोई साझा उद्देश्य है, न कोई दीर्घकालिक रणनीति। समाज यह तय नहीं कर पा रहा कि उसका विकास किस दिशा में हो और प्राथमिकताएं क्या हों। जब नेतृत्व बिखरा हुआ हो और आपसी समन्वय का अभाव हो, तो समाज का दिशाहीन होना स्वाभाविक है।


जितेंद्र कुशवाहा ने यह भी चिंता जताई कि संगठनों के भीतर व्यक्तिगत द्वेष, आपसी मतभेद और अहंकार समाजहित पर भारी पड़ रहे हैं। छोटे-छोटे मतभेदों को इतना बड़ा बना दिया जाता है कि समाज के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और व्यक्तिगत विवाद आगे आ जाते हैं। इसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।


युवाओं को लेकर उन्होंने विशेष रूप से कहा कि सामाजिक संगठनों को युवाओं को जोड़ने, उन्हें नेतृत्व के लिए तैयार करने और सकारात्मक दिशा देने का केंद्र बनना चाहिए था। लेकिन आज कई संगठन युवाओं को जोड़ने के बजाय संगठनात्मक राजनीति के कारण उनसे दूरी बना रहे हैं। युवाओं की ऊर्जा और विचारों का सही उपयोग न होना समाज के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।


अपने संदेश में जितेंद्र कुशवाहा ने सभी सामाजिक संगठनों से आत्ममंथन की अपील करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाजहित को सर्वोपरि रखा जाए। समन्वय, संवाद और सहयोग के बिना कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता। एक साझा मंच, साझा लक्ष्य और एक स्पष्ट दिशा तय करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि समाज को अब संगठनों की संख्या नहीं, बल्कि एकजुट और समन्वित नेतृत्व की आवश्यकता है।
जब तक सामाजिक संगठन एक दिशा में संगठित होकर कार्य नहीं करेंगे, तब तक समाज का चहुंमुखी विकास केवल विचारों और घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा।
समाज को जागृत करने का समय अब है, और यह तभी संभव है जब संगठन आपसी समन्वय के साथ आगे बढ़ें।

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