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	<title>पढ़ें कथा Archives - Ad Event Media</title>
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		<title>जैन समुदाय का मासिक रोहिणी व्रत 20 फरवरी को, पढ़ें कथा</title>
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		<pubDate>Fri, 19 Feb 2021 23:30:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। फरवरी 2021 में यह व्रत 20 फरवरी, शनिवार को रखा जाएगा। यहां पढ़ें व्रत की कथा- 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्‍व है। यह</p>
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<p>जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्&#x200d;वपूर्ण स्&#x200d;थान है। फरवरी 2021 में यह व्रत 20 फरवरी, शनिवार को रखा जाएगा। यहां पढ़ें व्रत की कथा-</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="800" height="600" src="https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg" alt="" class="wp-image-26047" srcset="https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg 800w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-300x225.jpg 300w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-150x113.jpg 150w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-768x576.jpg 768w" sizes="(max-width: 800px) 100vw, 800px" /></figure>



<p>27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्&#x200d;व है। यह व्रत आत्&#x200d;मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है।</p>



<p><strong>यहां पाठकों के लिए पेश है रोहिणी व्रत की संपूर्ण कथा</strong></p>



<p>रोहिणी व्रत के संबंध में पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्&#x200d;मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्&#x200d;तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? </p>



<p>तो उन्&#x200d;होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्&#x200d;वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्&#x200d;या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्&#x200d;न हुआ।</p>



<p>एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्&#x200d;चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्&#x200d;यों है?</p>



<p>तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्&#x200d;तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्&#x200d;या उत्पन्&#x200d;न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्&#x200d;या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्&#x200d;यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया।</p>



<p>इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्&#x200d;होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्&#x200d;य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्&#x200d;बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्&#x200d;यंत वेदना हुई और तत्&#x200d;काल उन्&#x200d;होंने प्राण त्&#x200d;याग दिए।</p>



<p>जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्&#x200d;होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्&#x200d;पन्&#x200d;न हो गया। अत्&#x200d;यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्&#x200d;पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्&#x200d;या हुई।</p>



<p>यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्मकार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो। तब स्वामी ने कहा- सम्&#x200d;यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्&#x200d;याग करें और श्री जिन चैत्&#x200d;यालय में जाकर धर्मध्&#x200d;यान सहित 16 प्रहर व्&#x200d;यतीत करें अर्थात सामायिक, स्&#x200d;वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्&#x200d;वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें।</p>



<p>दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्&#x200d;वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई। इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्&#x200d;वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्&#x200d;यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्&#x200d;वरूप स्वर्गों में उत्&#x200d;पन्&#x200d;न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्&#x200d;वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्&#x200d;त हुए।</p>
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