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	<title>जीवन के उतार-चढ़ाव से जूझना और उनसे उबरना ही जिंदगी है Archives - Ad Event Media</title>
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		<title>जीवन के उतार-चढ़ाव से जूझना और उनसे उबरना ही जिंदगी है</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Mar 2021 08:48:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>ऐसी ही एक चुनौती आज से एक साल पहले इंसानियत के सामने आई। एक अदने से वायरस ने लोगों को बीमार करना शुरू किया। एक के बाद एक देश में इस बीमारी से ग्रसित लोगों की संख्या बढ़ने लगी। बीमारी महामारी बन चुकी थी। दुनिया इसके लिए तैयार नहीं थी। लॉकडाउन ही एक मात्र उपाय</p>
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<p>ऐसी ही एक चुनौती आज से एक साल पहले इंसानियत के सामने आई। एक अदने से वायरस ने लोगों को बीमार करना शुरू किया। एक के बाद एक देश में इस बीमारी से ग्रसित लोगों की संख्या बढ़ने लगी। बीमारी महामारी बन चुकी थी। दुनिया इसके लिए तैयार नहीं थी।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="650" height="540" src="https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/sdcsxcf-2.jpg" alt="" class="wp-image-29667" srcset="https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/sdcsxcf-2.jpg 650w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/sdcsxcf-2-300x249.jpg 300w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/sdcsxcf-2-150x125.jpg 150w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>लॉकडाउन ही एक मात्र उपाय था। सभी देशों ने अर्थव्यवस्था पर जीवन को तरजीह दी और लॉकडाउन करना शुरू किया। भारत में 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया। लोगों का यह स्वघोषित बंद उत्साहजनक रहा। सड़कें सूनी रहीं। 24 मार्च को रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया और अगले 21 दिन के लिए पहला लॉकडाउन लगाया गया। बाद में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई। तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जिंदगी ढर्रे पर लौटी।</p>



<p><strong>बना डाला किफायती वेंटीलेटर:&nbsp;</strong>कोरोना संक्रमण के दस्तक देते ही कानपुर स्थित हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) के दो पूर्व छात्रों ने वेंटीलेटर तैयार कर दिया। इसे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) की गाइडलाइन के अनुरूप&nbsp;बनाया गया। इसका परीक्षण सांस रोगियों पर कानपुर और बेंगलुरु में हो चुका है। कीमत भी सिर्फ एक लाख रुपये है। शिवशंकर उपाध्याय और शुभांकर बंका ने&nbsp;मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की वेंटीलेटर के डिजाइन में बदलाव करके इसका निर्माण किया है। इसे सरकारी स्कूल, धर्मशाला या छोटे अस्पतालों में भी</p>



<p><strong>आसानी से चलाया जा सकता है और लागत भी कम आती है।&nbsp;</strong></p>



<p><strong>कोरोना को मारती है दिगंतिका की वाटर गन:&nbsp;</strong>कोरोना को खत्म करने में मददगार साबित हो सकती है। मेमारी के वीएम इंस्टीट्यूशन यूनिट-दो की 18 साल की इस छात्रा ने ऐसी वायरस डिस्ट्रॉयर वाटर गन बनाई है, जो कोरोना का खात्मा करती है। इस तकनीक में जल अणुओं को विद्युत प्रवाह से आवेशित किया गया है। यह पानी कोरोना समेत अन्य सूक्ष्म जीवों के संपर्क में आते ही उसके प्रोटीन खोल को तोड़ देता है। बैट्री चालित इस गन के निर्माण में 1,500 रुपये की लागत आई है। दरअसल, इस वाटर गन में एक सर्किट (परिपथ) है। इसमें लगा ट्रांसफॉर्मर बैट्री से उत्पादित विद्युत का वोल्टेज 20 हजार वोल्ट तक कर देगा। बैट्री का धनात्मक (पॉजिटिव) सिरा सर्किट किट से व ऋणात्मक (निगेटिव) सिरा नोजल (जहां से पानी निकलेगा) से जुड़ा होगा। बैट्री का निगेटिव सिरा पानी को आवेशित करेगा। सर्किट में बैट्री का पॉजिटिव सिरा होगा, जो तीन घन फीट के हिस्से में धनात्मक आवेश का प्रवाह करेगा। पानी के अणु जब किसी वायरस या कवक कोशिका के संपर्क में आएंगे तो ये सूक्ष्म जीव धन और ऋण को जोड़कर सर्किट को पूरा कर देगा। नतीजा इनका प्रोटीन खोल नष्ट हो जाएगा। इसके लिए रीजनल साइंस सेंटर भोपाल ने दिगंतिका को वर्ष 2020 में सम्मानित किया है।</p>



<p><strong>संवाद में बाधक नहीं रहा मास्क:</strong> उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का महिमा स्वयं सहायता समूह मास्क और सैनिटाइजर बनाता है। समूह की नौ महिलाओं ने मूक- बधिर दिव्यांगजन का खयाल किया और उनके लिए पारदर्शी मास्क बना दिया। ऐसा मास्क, जिससे इशारे की भाषा पार आने लगी। 20 हजार रुपये से शुरू काम अब ढाई-तीन लाख रुपये महीने तक पहुंच गया है। अध्यक्ष सुनीता बताती हैं कि मूक-बधिर दिव्यांगजन हाथ व होंठ के इशारों से संवाद करते हैं। इसके लिए उन्हेंं मास्क उतारना पड़ता था। हमने निर्णय लिया कि ऐसा मास्क बनाएंगे जो उनके संवाद में बाधक न बने। ग्लैक्सो जैसी कंपनी ने 25 हजार मास्क का ऑर्डर दिया, लेकिन धन की कमी आड़े आ गई। इस पर प्रशासन ने मदद की और काम चल निकला।</p>



<p><strong>तब सहारनपुर, जालंधर से दिखता था हिमालय, अब आभास भी नहीं:</strong>&nbsp;कोरोना संक्रमण की महामारी को रोकने के लिए लॉकडाउन लागू हुआ। फैक्टियों में ताले&nbsp;लटक गए। सड़कें वीरान हो गईं। देश को इसका आर्थिक नुकसान तो हुआ, लेकिन पर्यावरण बेहतर हो गया। हवा साफ हो गई। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से&nbsp;हिमालय दिखने लगा। अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई। धीरे-धीरे कामकाज शुरू होने लगे। आज स्थितियां बदल चुकी हैं। जहां से पिछले साल हिमालय साफ दिखाई&nbsp;देने लगा था, वहां से अब उसका आभास भी नहीं होता।</p>



<p>इसी प्रकार पंजाब के जालंधर से करीब 100 किलोमीटर दूर हिमाचल प्रदेश में स्थित धौलाधार की पहाड़ियां&nbsp;साफ नजर आने लगी थीं। अब हिमालय की इस पर्वत श्रृंखला का अहसास तक नहीं होता।</p>



<p>कोरोना को रोकने के लिए जब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ तो लोग घरों में कैद हो गए। इस दौरान विभिन्न वर्गों के लोगों ने कैसा महसूस किया,&nbsp;</p>



<p><strong>नेता:</strong>&nbsp;मप्र के सीएम शिवराज की बदली दिनचर्या: कोरोना की दूसरी लहर से मध्य प्रदेश को बचाने की चुनौती ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दिनचर्या बदल&nbsp;दी है। प्रदेश के हालात पर प्रशासनिक टीम के साथ नजर रखते हुए वे प्रतिदिन करीब 16 घंटे काम कर रहे हैं। उनके दिन की शुरुआत हमेशा की तरह सुबह करीब&nbsp;पांच बजे योग-व्यायाम के साथ होती है। साढ़े छह बजे तक योग-व्यायाम चलता है। उदय होते सूर्य को अघ्र्य देते हैं और पूजा करते हैं। करीब साढ़े सात बजे के&nbsp;बाद समाचार-पत्र पढ़ते हैं और नाश्ते में पपीता, पोहा के साथ एक पराठा लेते हैं। इसके बाद शुरू होता है बैठकों का क्रम। घर से निकलते समय भुने हुए थोड़े चने&nbsp;रख लेते हैं, जो भूख लगने पर काम आ जाते हैं। वे मैराथन बैठकों के माध्यम से उसी तरह पूरे प्रदेश की स्थिति पर नजर रख रहे हैं, जैसा उन्होंने ठीक एक साल&nbsp;पहले किया था। प्रदेश की सत्ता चौथी बार संभालते ही सीएम चौहान कोरोना से जंग में जुट गए थे।</p>



<p><strong>विद्यार्थी:&nbsp;</strong>छूटा स्कूल, लैपटॉप में सिमटी दुनिया: प्रयागराज के जार्जटाउन निवासी निवासी आर्ना श्रीवास्तव सेंट मैरीज कॉलेज में कक्षा चार में पढ़ती है। उसके दिन की शुरुआत अब भी सुबह करीब छह बजे होती है। कुछ देर छत पर टहलती है। नाश्ते के बाद नौ बजे से लैपटॉप की मदद से पढ़ाई करती है। दोपहर 12 बजे लंच होता है। दो बजे से संगीत की कक्षा शुरू होती है और घंटे भर चलती है। चार से पांच बजे तक योग व डांस की कक्षाएं भी ऑनलाइन होती हैं। करीब घंटे भर विश्राम के बाद ताइक्वांडो का प्रशिक्षण लेती है। कुछ समय पहले तक यह कक्षा भी ऑनलाइन थी, लेकिन अब घर में ही प्रशिक्षक आने लगे हैं। सात बजे हल्का-फुल्का नाश्ता होता है। 8:30 बजे तक पढ़ाई होती है। इसके बाद घर के बगीचे में ही साइकिल चलाती है। रात करीब 9:30 बजे खाना खाकर सो जाती है। मां डॉ. मधु श्रीवास्तव प्रभु से प्रार्थना करती हैं कि जल्द कोरोना संक्रमण खत्म हो ताकि बच्चे स्कूल जा सकें।&nbsp;</p>
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