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	<title>कोविड-19 के आपदा में जन्म लिया मौके ने Archives - Ad Event Media</title>
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		<title>कोविड-19 के आपदा में जन्म लिया मौके ने, फैक्ट्री हुई बंद; हुनर ने संभाला</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Mar 2021 07:09:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पिछले साल चीन के वुहान से शुरू होकर कोरोना संक्रमण पूरी दुनिया में तेजी से फैलने लगा। विज्ञानी वायरस को खत्म करने के तरीके खोज रहे थे, लेकिन इसके प्रसार को तत्काल रोकना जरूरी था। ऐसे में भारत समेत दुनिया के कई देशों ने लॉकडाउन का निर्णय लिया। 25 मार्च, 2020 से भारत में लॉकडाउन</p>
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<p>पिछले साल चीन के वुहान से शुरू होकर कोरोना संक्रमण पूरी दुनिया में तेजी से फैलने लगा। विज्ञानी वायरस को खत्म करने के तरीके खोज रहे थे, लेकिन इसके प्रसार को तत्काल रोकना जरूरी था। ऐसे में भारत समेत दुनिया के कई देशों ने लॉकडाउन का निर्णय लिया। 25 मार्च, 2020 से भारत में लॉकडाउन की शुरुआत हुई। सब कुछ ठहर गया, लेकिन जिजीविषा ने नए रास्तों को जन्म दिया। महामारी से मुकाबला करते हुए हर स्तर पर जिंदगी को रफ्तार देने के सम्यक प्रयास होते रहे। पेश है विशेष आयोजन&#8230;</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="650" height="540" src="https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/SSSSDC.jpg" alt="" class="wp-image-29742" srcset="https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/SSSSDC.jpg 650w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/SSSSDC-300x249.jpg 300w, https://adeventmedia.com/wp-content/uploads/2021/03/SSSSDC-150x125.jpg 150w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p><strong>काम छूटा तो खड़ा किया कारोबार:</strong>&nbsp;जालंधर में आउटसोर्स पर काम कर रहे पुरुषोत्तम वत्स कोरोना काल में बेरोजगार हो गए। पटना लौटने पर कपड़े का कारोबार शुरू किया। प्रशासन ने मदद की और काम चल निकला। आज स्कूली बच्चों की ड्रेस के साथ-साथ बाजार की अन्य मांगों को भी पूरा कर रहे हैं। चूंकि मांग अधिक हो गई है, इसलिए आउटसोर्स भी करना पड़ रहा है। जो कल तक खुद आउटसोर्स पर काम कर रहा था, आज औरों को काम दे रहा है। इनकी फैक्ट्री पटना के बेऊर में है, जिसमें अभी 11 लोग काम कर रहे हैं। इनमें दूसरे प्रदेशों से लौटे नौ वे लोग हैं, जिनका रोजगार छिन गया था।</p>



<p>पुरुषोत्तम ने बताया कि मार्केटिंग का काम वह खुद देखते हैं। दूसरे प्रदेशों से लौटे कारीगर कटिंग, स्टीचिंग व पैकेजिंग करते हैं। सभी कार्य में निपुण हैं, इसलिए उत्पाद में गुणवत्ता की शिकायत नहीं है। उद्योग विभाग ने टीम को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक व तकनीकी मदद भी मुहैया कराई है। उन्होंने बताया कि सीमित संसाधन में काम शुरू किया है। अभी स्थानीय मांगों को ही पूरा नहीं कर पा रहे हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उत्पाद को डिस्प्ले किया तो अफ्रीका के कई देशों से बड़ी संख्या में ऑर्डर आने लगे। अगले चरण में एक्सपोर्ट करेंगे, इसके लिए प्रशासन से संपर्क किया है।&nbsp;</p>



<p><strong>फैक्ट्री पर लगा ताला, हुनर ने संभाला:</strong> चेतन अग्रवाल नोएडा में प्लास्टिक मोल्डिंग की फैक्ट्री चलाते थे। दवाओं के डिब्बे बनाने का काम था। लॉकडाउन हुआ और ऑर्डर रद होते गए। फैक्ट्री में ताले लटक गए। रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गई। खाली बैठने से बात नहीं बनने वाली थी, इसलिए चेतन रोजगार के विकल्प तलाशने लगे। लॉकडाउन में लोग घर से काम कर रहे थे, इसलिए लैपटॉप की मांग बढ़ गई थी। उत्पादन सीमित था। चेतन ने इस जरूरत को भुनाने का फैसला किया। उनके पास इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीफर्बिशिंग (मरम्मत) का अनुभव था। जरूरत के वक्त यही हुनर उनके काम आ गया। चेतन ने पुराने लैपटॉप को मॉडिफाई कर किराये पर देना शुरू किया। मांग के अनुरूप उन्हें बेचने भी लगे। इस बीच बड़ी संख्या में लैपटॉप की मांग आने लगी। चेतन ने उनसे संपर्क किया जो स्क्रैप में लैपटॉप खरीदते थे। पुराने लैपटाप की रीफर्बििशंग की व कंपनियों में आपूर्ति कर दी। इस प्रकार दर्जनों कंपनियां ग्राहक बन गईं।&nbsp;</p>



<p><strong>असल जिंदगी में भी हीरो बने सोनू सूद:&nbsp;</strong>लॉकडाउन में रील लाइफ से निकलकर अभिनेता सोनू सूद रियल लाइफ के हीरो बन गए। मूल रूप से पंजाब के मोगा के रहने वाले सोनू सूद ने अप्रैल, 2020 के पहले सप्ताह में मुंबई के जुहू स्थित अपना छह मंजिला होटल शक्ति सागर चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ के विश्रम के लिए खोल दिया। रोजाना 45,000 कामगारों के लिए भोजन का प्रबंध किया। ठाणो में फंसे कर्नाटक के 350 कामगारों को दो दिन का राशन देकर 10 बसों से रवाना किया। सोनू ने उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड के करीब 1.5 लाख से अधिक कामगारों को वापस घर पहुंचने में मदद की। इतनी ही नहीं, विदेश में फंसे 6,700 लोगों की वतन वापसी भी करवाई। 13 मासूम बच्चों को लिवर ट्रांसप्लांट के लिए मनीला (फिलीपींस) से भारत लाने का प्रबंध किया। दिल्ली के अपोलो और मैक्स अस्पताल में अपने खर्च पर लिवर ट्रांसप्लांट करवाया। लोगों की सेवा करते-करते सोनू कर्ज के बोझ तले दब गए। आठ संपत्तियों को गिरवी रखकर उन्होंने बैंक से दस करोड़ का लोन लिया। लोगों के लिए रोजगार की भी व्यवस्था कर रहे हैं।&nbsp;</p>



<p>वर्दी कराती रही जिम्मेदारी का अहसास, देती रही हिम्मत: मेरी तैनाती कानपुर नगर के थाना कोहना में है। कोरोना की शुरुआत में मैं भी थोड़ा चिंतित था। 15 मई, 2020 को मेरा विवाह तय था। लेकिन, खाकी पहनते समय जो संकल्प लिया था उससे हौसला मिलता रहा। लोगों को हिम्मत देता रहा। कई की मदद की। एक दिन तिलक नगर से बुजुर्ग दंपती का फोन आया। कहा, खाने के लिए कुछ नहीं है। तत्काल उनके घर फल, सब्जियां व दूध पहुंचाया। ऐसे कई मौके आए। सेवा से संबल मिलता रहा।</p>



<p><strong>ब्याज पर ब्याज के खिलाफ लड़ी ‘सुप्रीम लड़ाई’:&nbsp;</strong>आगरा निवासी गजेंद्र शर्मा ने लॉकडाउन में लोन मोरेटोरियम (ईएमआइ भुगतान स्थगन) के लाभार्थियों को ब्याज पर ब्याज से राहत दिलाने के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी। आरबीआइ ने मोरेटोरियम के तहत राहत देने का एलान किया था। बाद में ब्याज पर ब्याज लिए जाने का मामला आया तो गजेंद्र शर्मा परेशान हो गए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चार मई, 2020 को याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने 27 नवंबर, 2020 को ब्याज पर ब्याज को माफ करने का आदेश सुनाया। इससे देशभर के करीब 17 करोड़ लोन धारकों को राहत मिली।</p>



<p><strong>अनुभव का साल</strong></p>



<p><strong>परिवार:&nbsp;</strong>अब चाय नहीं, हल्दी वाला दूध व काढ़ा</p>



<p>पटना के कदमकुआं निवासी विनीता के घर में चार पीढ़ियां साथ रहती हैं। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए इनकी आदतों में बदलाव हुआ जो अब भी बरकरार है। बड़े-बच्चे सभी बाहर से आने पर हाथ-पैर धोते हैं। दादी सास दुर्गा देवी 85 वर्ष की हैं। पहले बच्चे बाहर से आने के साथ ही दादी मां की गोद में चले जाते थे, अब ऐसा नहीं होता। पहले उन्हें हाथ-पैर साफ करना पड़ता है। खान-पान में स्वाद की जगह गुणवत्ता को तरजीह दी जाती है। पहले घर में चाय-कॉफी बनती थी। अब हल्दी वाले दूध, काढ़ा व गिलोय ने जगह ले ली है।&nbsp;</p>



<p>गृहिणी:&nbsp;चुनौतियों ने सिखाया भी बहुत कुछ</p>



<p>‘बीता साल मुझ जैसी करोड़ों गृहिणियों के लिए चुनौतीपूर्ण था। लॉकडाउन के बाद जिंदगी में बहुत कुछ नया सीखा। मुश्किल वक्त में खुद को और परिवार को कैसे मैनेज किया जाए यह लॉकडाउन और कोरोना काल ने सिखा दिया।’ चंडीगढ़ निवासी गृहिणी सरोजा बाला बताती हैं, ‘घर में बंद रहने का अहसास अलग था। दिनचर्या पूरी तरह बदल गई थी। अन्य सदस्यों के शेड्यूल में बदलाव का सबसे ज्यादा प्रभाव मेरी दिनचर्या पर पड़ा। लॉकडाउन से पहले सुबह उठकर बेटा प्रेरित व बेटी रावी को तैयार करती थी। बच्चे सुबह सात बजे स्कूल जाते थे। कक्षाएं ऑनलाइन हो गईं। यह भी अलग अनुभव रहा। पहले बच्चों को स्कूल व पति को दफ्तर भेजने के बाद अपने लिए वक्त निकाल लिया करती थी, लेकिन लॉकडाउन में ऐसा कम ही हो पाया।’</p>
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