Share with your friends










Submit
News & Views

Chandrayaan – 2 : New update on Lander Vikram

तकनीकी खामी के चलते 15 जुलाई को टाल दी गई थी.  22 जुलाई को मिशन लॉन्च किया गया. इसरो ने अपने शक्तिशाली रॉकेट जीएसएलवी मार्क-।।। एम 1 के जरिए 3,840 किग्रा वजनी ‘चंद्रयान-2’ को लॉन्च किया था.  योजना पर 978 करोड़ रुपये की लागत आई है.

भारतीय इसरो द्वारा चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का अभियान शनिवार को अपनी  योजना के मुताबिक पूरा नहीं हो पाया था.

लैंडर को शुक्रवार देर रात लगभग एक बजकर 38 मिनट पर चांद की सतह पर उतारने की प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन चांद पर नीचे की तरफ आते समय 2.1 किलोमीटर की ऊंचाई पर जमीनी  से इसका संपर्क टूट गया.

वैज्ञानिक ऑर्बिटर के जरिए विक्रम लैंडर को संदेश भेजने की कोशिश कर रहे हैं इसरो ने कहा है कि ऑर्बिटर से मिली तस्वीर से विक्रम लैंडर के साबुत बचे होने का पता चला है। चांद की सतह पर टेढ़ा खड़ा है।

लैंडर विक्रम से संपर्क टूटने के कुछ देर बाद ही वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया था कि ऑर्बिटर अच्छे से काम कर रहा है और संपर्क में है। वह पूर्व निर्धारित प्रोग्राम के अनुसार, चंद्रमा के चक्कर लगा रहा है। ऑर्बिटर ने रविवार को इसरो को दो खुशखबरी दी। पहला उसने थर्मल इमेजेज के जरिए लापता लैंडर का पता लगा लिया है। दूसरा ये कि ऑर्बिटर, लैंडर की कमी को काफी हद तक पूरा करेगा।

चंद्रयान-2 मिशन के लिए ये बड़ी खुशखबरी है कि ऑर्बिटर अब एक साल की बजाय सात साल से ज्यादा समय तक काम करेगा। ये भी इसरो के वैज्ञानिकों के लिए बड़ी उपलब्धि है। दरअसल, वैज्ञानिकों ने पूरे मिशन में ऑर्बिटर को इस तरह से नियंत्रित किया है कि उसमें उम्मीद से ज्यादा ईंधन बचा हुआ है। इसकी मदद से ऑर्बिटर सात साल से ज्यादा समय तक, तकरीबन साढ़े सात साल तक चंद्रमा के चक्कर काट सकता है। ये जानकारी इसरो प्रमुख के सिवन ने मीडिया से बातचीत के दौरान

लैंडर से संपर्क साधने पर फोकस
इसका मतलब ये है कि ऑर्बिटर अब एक साल बजाय सात साल तक काम करते हुए इसरो को कहीं ज्यादा जानकारी भेज सकता है। वैज्ञानिक ऑर्बिटर से प्राप्त डाटा का अध्ययन कर इस दिशा में काम कर रहे हैं। फिलहाल, इसरो का पूरा फोकस फिलहाल चांद की दक्षिणी सतह पर उतरे लैंडर विक्रम से दोबारा संपर्क स्थापित करने का है। दरअसल, लैंडर को एक लूनर डे (पृथ्वी के 14 दिन) तक खोज करने के लिए ही बनाया गया है। इस दौरान उससे दोबारा संपर्क होने की संभावना ज्यादा है। इसके बाद भी लैंडर से संपर्क स्थापित हो सकता है, लेकिन उसकी संभावना बहुत कम हो जाएंगी।

दो तरह की ऊर्जा की आवश्यकता होती है
वैज्ञानिकों के अनुसार ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर को काम करने के लिए दो तरह की ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पहली इलेक्ट्रिकल ऊर्जा होती है, जिसका इस्तेमाल उपकरणों को चलाने के लिए किया जाता है। ये ऊर्जा ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर पर लगे सोलर पैनलों के जरिए सूर्य की रोशनी से मिलती है। इन उपकरणों को दूसरी ऊर्जा के लिए ईंधन की जरूरत होती है, जिसका इस्तेमाल इनकी दिशा में परिवर्तन के लिए किया जाता है। इसरो प्रमुख के सिवन के अनुसार, हमारे ऑर्बिटर में अभी उम्मीद से ज्यादा ईंधन बचा हुआ है। इसकी मदद से चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर सात साल से ज्यादा समय तक सफलतापूर्वक चंद्रमा के चक्कर लगा सकता है।

सॉफ्ट की जगह हुई हार्ड लैंडिंग
इसरो को चंद्रयान-2 के लैंडर की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करानी थी। सॉफ्ट लैंडिंग हॉलीवुड की साइंस फिक्सन फिल्मों में दिखाई जाने वाली उड़नतस्तरियों जैसी होती है। सॉफ्ट लैंडिंग में लैंडर की गति को धीरे-धीरे कम किया जाता है, ताकि वह आराम से चांद की सतह पर पूर्व निर्धारित जगह पर उतर सके। अंतिम समय पर जब लैंडर चंद्रमा की सतह से महज 2.1 किमी की दूरी पर था कि लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया। इस वजह से चांद पर उसकी सॉफ्ट लैंडिंग होने की बजाए हार्ड लैंडिंग हुई। हार्ड लैंडिंग में लैंडर या स्पेसक्राफ्ट चांद की सतह पर क्रैश करता है मतलब गिरता है। अब तक अमेरिका, रूस और चीन ही चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में कामयाब रहे हैं। हालांकि, ये तीनों देश भी अब तक चांद के सबसे जटिल दक्षिणी ध्रुव पर अब तक नहीं पहुंचे हैं, जहां भारत ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है।

ऑर्बिटर से उम्मीदें बढ़ीं
एक साल की बजाय सात साल तक काम करने योग्य ईंधन होने की वजह से ऑर्बिटर से उम्मीदें बढ़ गई हैं। ऑर्बिटर फिलहाल चांद की कक्षा में 100 किलोमीटर की दूरी पर सफलतापूर्वक चक्कर काट रहा है। हालांकि, 2379 किलो वजन के ऑर्बिटर को एक साल तक के मिशन के लिए प्रोग्राम किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऑर्बिटर चूंकि ठीक से काम कर रहा है और वह पहले की तुलना में ज्यादा समय तक काम कर सकता है तो इसका मतलब ये है कि आने वाले दिनों में उससे कई अहम डाटा प्राप्त हो सकते हैं। इनकी मदद से वैज्ञानिकों को कई नई जानकारियां प्राप्त हो सकती हैं।

More share buttons
Share on Pinterest
Share with your friends










Submit
Tags

Related Articles

Close